Sahil Diwan Podcast | Toys, Childhood, Parenting, Outdoor Play & Screen Time
बचपन में एक खिलौना सिर्फ खिलौना नहीं होता। वह किसी बच्चे की खुशी, उसकी curiosity, उसकी creativity और कई बार उसकी सबसे प्यारी childhood memory बन जाता है।
लेकिन आज बच्चों की दुनिया बदल रही है। Toys के साथ mobile phones, YouTube, online games और digital content भी उनकी रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
The Socialens Talks की इस बातचीत में Sahil Diwan, जो 2013 से toy business में हैं, बच्चों के बदलते व्यवहार, toys की दुनिया, parenting, screen time, outdoor play, educational toys और customer satisfaction पर अपने अनुभव साझा करते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि एक toy shopkeeper के लिए केवल सामान बेचना ही उद्देश्य नहीं होना चाहिए—बच्चे और उनके parents को सही चीज़ चुनने में मदद करना भी महत्वपूर्ण है।
13 साल का सफर: Family Business से Toy Store तक
Sahil बताते हैं कि उनका परिवार पहले से business से जुड़ा रहा है और उन्होंने 2013 में toy business की शुरुआत की। तब से लगभग 13–14 वर्षों का सफर पूरा हो चुका है।
उनके लिए इस business की सबसे खास बात केवल दुकान चलाना नहीं है। रोज़ बच्चों को दुकान पर आते, toys देखते और excited होते देखना उनके लिए अपने आप में एक अनुभव है।
कई बच्चे उन्हें और उनकी दुकान को नाम से पहचानते हैं और नियमित रूप से आते हैं। बच्चों से बात करना और यह समझना कि वे वास्तव में क्या चाहते हैं, Sahil के business experience का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
बच्चे के चेहरे की खुशी: Toy से कहीं ज्यादा बड़ी चीज़
Sahil के लिए toys की सबसे खूबसूरत बात बच्चों की खुशी है।
उन्होंने parenting के अपने अनुभव से बताया कि जब कोई parent अपने बच्चे को toy देता है, तो उसकी कीमत—चाहे ₹100 हो या ₹1,000—उस समय उतनी महत्वपूर्ण नहीं रहती। असली चीज़ बच्चे के चेहरे पर दिखाई देने वाली खुशी है।
कई बार बच्चा toy से खेलता है, उसे तोड़ भी देता है, लेकिन उस moment की खुशी parent के लिए बहुत खास होती है।
यही शायद toy business को बाकी businesses से थोड़ा अलग बनाता है। यहां product के साथ एक emotional moment भी जुड़ा होता है।
Mobile या Toy? Sahil का जवाब बिल्कुल स्पष्ट था
जब उनसे पूछा गया कि Mobile या Toy?
उनका जवाब था: Toy.
लेकिन उनका दृष्टिकोण केवल mobile को गलत बताने वाला नहीं था।
Sahil मानते हैं कि आज mobile और technology बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। Parents खुद भी दिनभर फोन का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए बच्चों को technology से पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक नहीं है।
उन्होंने यह उदाहरण भी दिया कि आज का छोटा बच्चा technology को बहुत तेजी से समझ लेता है। Internet और AI जैसे tools से बच्चे बहुत कुछ सीख भी रहे हैं। लेकिन इसके साथ limit और parental watch भी जरूरी है।
उनके अनुसार technology का सवाल केवल “फोन देना है या नहीं” का नहीं है। असली सवाल है—बच्चा उसका इस्तेमाल किस दिशा और किस सीमा में कर रहा है।
Screen Time को लेकर एक Balanced Approach
Sahil के अनुसार screen को पूरी तरह हटाना आसान समाधान नहीं है।
उन्होंने कहा कि आज बच्चों के लिए technology learning का माध्यम भी बन सकती है। उदाहरण के लिए, उनकी दुकान में एक educational toy के साथ QR code दिया जाता है, जिसे scan करके बच्चा YouTube video देखकर उस toy को operate करना सीख सकता है।
इस तरह mobile उसी समय learning tool बन जाता है।
इसलिए उनके विचार में सवाल technology को छोड़ने का नहीं बल्कि उसके इस्तेमाल की सीमा तय करने का है।
Age Group के हिसाब से सही Toy चुनना
Sahil बताते हैं कि उनकी दुकान पर parents को toy चुनने में guide करते समय बच्चे की age, interest और requirement को देखा जाता है।
कुछ बच्चे cars की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं। कुछ dolls पसंद करते हैं। कुछ बच्चे अलग तरह के creative या educational games में interest दिखाते हैं।
उनके लंबे experience की वजह से वे बातचीत और बच्चे के behaviour को देखकर यह समझने की कोशिश करते हैं कि बच्चे की रुचि किस दिशा में है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि Sahil खुद को केवल salesman नहीं मानते। उनका कहना है कि parent का budget, बच्चे की जरूरत और उसके लिए क्या बेहतर हो सकता है—इन सबको ध्यान में रखकर suggestion देना चाहिए।
हर महंगा Toy बेहतर नहीं होता
Toy खरीदते समय एक सामान्य धारणा होती है कि महंगा toy शायद बेहतर होगा।
Sahil इस सोच से सहमत नहीं हैं।
उन्होंने बताया कि कम कीमत में भी अच्छी quality, engagement और educational value वाले toys उपलब्ध हो सकते हैं। उनका काम customer को available options और उनकी quality के बारे में बताना है; अंतिम decision customer का होता है।
इस दृष्टिकोण में product की कीमत से ज्यादा value और suitability पर ध्यान दिखाई देता है।
Toys में Technology और Education का Combination
Sahil ने बातचीत में एक interesting educational toy दिखाया जिसमें human body के अलग-अलग organs और parts को समझने का तरीका दिया गया था।
बच्चा उसमें अलग-अलग parts को सही जगह लगाने की कोशिश करता है और साथ में manual तथा QR-based video की मदद से उसे समझ सकता है।
इस तरह एक toy में:
- खेलने का element
- curiosity
- creativity
- learning
- technology
एक साथ आ सकते हैं।
Sahil ने एक और concept की बात की—ऐसा toy जिसमें बच्चा खुद parts assemble करके अपनी remote-control car या कोई दूसरी चीज़ तैयार करे।
उनके अनुसार इससे बच्चे को केवल खेलने का अनुभव नहीं मिलेगा, बल्कि वह यह भी समझ सकेगा कि tyre, battery, circuit और दूसरे parts कैसे काम करते हैं। Toy बनाने के बाद उसे चलाने से बच्चे में sense of ownership भी पैदा हो सकता है।
क्या आज के बच्चे Toys से जल्दी ऊब जाते हैं?
बातचीत में Sahil ने अपने बचपन और आज के बच्चों के बीच एक दिलचस्प अंतर बताया।
उनके बचपन में एक toy कई महीनों तक चलता था। किसी birthday पर मिला toy लंबे समय तक याद रहता था।
आज कई बार बच्चा थोड़ी देर toy से खेलने के बाद दूसरी चीज़ मांगने लगता है। Sahil ने इसे बच्चों की curiosity और energy से भी जोड़ा, लेकिन यह भी कहा कि mobile की वजह से toys और बच्चों के बीच का connection कई मामलों में कम हुआ है।
यह observation उनकी toy shop में रोज़ के अनुभव से आती है।
बचपन सिर्फ Toys से नहीं बनता
यह बातचीत का शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
Sahil के अनुसार बच्चों को toys जरूर मिलने चाहिए, लेकिन बचपन केवल toys तक सीमित नहीं होना चाहिए।
उन्होंने अपने बचपन को याद करते हुए बताया कि वे अपने parents और friends के साथ cricket, table tennis और दूसरे outdoor games खेलते थे। मिट्टी में खेलना, धूप में रहना और दोस्तों के साथ समय बिताना उनके childhood का हिस्सा था।
उनके अनुसार बच्चों को दूसरे बच्चों से मिलने-जुलने और social environment में सीखने का अवसर मिलना चाहिए।
Outdoor Play क्यों जरूरी है?
Sahil ने कहा कि physical activity बच्चों के लिए जरूरी है।
लेकिन उन्होंने साथ ही parents की एक वास्तविक चिंता को भी स्वीकार किया—आज बच्चों को बाहर भेजते समय safety को लेकर डर रहता है।
उन्होंने अपने पिता होने के अनुभव से बताया कि parents कई बार बच्चे को बाहर भेजने से पहले कई बार सोचते हैं। Phone कई बार safety और communication के लिए भी दिया जाता है।
इसलिए उनका point outdoor play बनाम indoor life का simple comparison नहीं है।
उनका message है कि safe environment के साथ बच्चों को बाहर जाने, दूसरे लोगों से मिलने और खुद अनुभव करने का अवसर मिलना चाहिए।
बच्चों को दूसरे बच्चों के साथ खेलने की जरूरत
Sahil का मानना है कि बच्चे अलग-अलग age groups के लोगों से मिलकर भी बहुत कुछ सीखते हैं।
उन्होंने कहा कि बच्चों को पूरी तरह घर के अंदर सीमित कर देने से उनके learning experiences भी सीमित हो सकते हैं।
उनके अनुसार social interaction और physical activity बच्चों के development के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इसीलिए उन्होंने parents को बच्चों के लिए ऐसा environment बनाने की बात कही जहां वे सुरक्षित तरीके से दूसरे बच्चों के साथ खेल सकें।
“Eagle की तरह नजर रखें, लेकिन बच्चे को उड़ने दें”
Sahil ने parents के लिए अपनी सबसे यादगार बात एक उदाहरण के रूप में कही:
ऊपर से नजर रखें, लेकिन बच्चे को नीचे freely explore करने दें।
उनका मतलब यह नहीं था कि parents बच्चों को बिना guidance के छोड़ दें।
बल्कि उनका विचार है कि parents:
- बच्चे पर नजर रखें
- जरूरत पड़ने पर guide करें
- safety का ध्यान रखें
- लेकिन हर छोटी चीज़ खुद तय न करें
- बच्चे को अपनी राह सीखने का अवसर दें
उन्होंने कहा कि classroom और formal education के अलावा life से मिलने वाली learning भी बहुत महत्वपूर्ण है।
हर बच्चे को एक जैसा बनाने की जरूरत नहीं
Sahil ने parents से बच्चों पर बहुत ज्यादा restrictions लगाने के बजाय थोड़ा freedom देने की बात की।
उन्होंने यह भी कहा कि हर बच्चा Einstein नहीं है और हर बच्चा गलत दिशा में भी नहीं है।
इसलिए बच्चे को अपनी interests और experiences के माध्यम से सीखने का अवसर मिलना चाहिए।
यह बात parenting के एक महत्वपूर्ण सवाल की ओर ले जाती है:
क्या हम बच्चों को केवल अपनी expectations के हिसाब से बड़ा कर रहे हैं, या उन्हें खुद discover करने का अवसर भी दे रहे हैं?
“Perfect Childhood” आखिर क्या है?
जब Sahil से पूछा गया कि उनके हिसाब से perfect childhood क्या है, तो उनका जवाब किसी expensive toy या modern facility के बारे में नहीं था।
उन्होंने अपने childhood को याद किया—parents के साथ खेलना, दोस्तों के साथ outdoor games खेलना और social environment में बड़ा होना।
उन्होंने उस समय की कम जरूरतों और ज्यादा interaction को याद किया।
उनके लिए childhood की value चीज़ों की संख्या में नहीं, बल्कि उस समय और experiences में है जो बच्चे को मिलते हैं।
Toys की दुनिया भी तेजी से बदल रही है
Sahil ने toy industry में हुए technological changes पर भी बात की।
उन्होंने अपने बचपन के simple toys से लेकर आज के remote-controlled, wireless और technology-based toys तक का अंतर बताया।
उन्होंने एक ऐसे remote-controlled lizard toy का उदाहरण दिया जो दीवार, जमीन और दूसरी surfaces पर चल सकता है। बच्चों की curiosity और नए toys की demand industry में लगातार innovation को बढ़ाती है।
उन्होंने यह भी बताया कि कई नए toys की जानकारी बच्चे खुद Internet और mobile के माध्यम से खोजकर shopkeepers तक लेकर आते हैं।
यानी आज कई मामलों में customer की demand ही retailer को नए products खोजने के लिए प्रेरित करती है।
Made in India Toys पर Sahil की सोच
बातचीत में उन्होंने Indian और imported toys के बीच अंतर पर भी चर्चा की।
Sahil ने कहा कि Made in India products में quality और service की सुविधा एक महत्वपूर्ण advantage हो सकती है—जैसे repair और spare parts की availability।
साथ ही उन्होंने यह भी माना कि कुछ नए और technically advanced toys पहले China से market में आते हैं और बाद में भारत में manufacturing शुरू होती है। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में Indian toy manufacturing में बदलाव दिखाई दिया है।
Toy Shop: Business या Mission?
जब उनसे पूछा गया कि उनकी toy shop उनके लिए business है या mission, तो उनका जवाब दोनों पहलुओं को जोड़ता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि business चलाना जरूरी है क्योंकि shop से घर, expenses और staff जुड़े हुए हैं।
लेकिन इसके साथ उनका व्यक्तिगत focus customer satisfaction पर है।
उनके अनुसार कोई customer ₹100 का toy खरीदे या ₹1,000 का—उसे संतुष्ट होकर जाना चाहिए।
यही सोच उनके business philosophy का महत्वपूर्ण हिस्सा दिखाई देती है।
Customer Satisfaction उनके लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
Sahil बताते हैं कि अगर कोई parent बाद में आकर कहता है कि पिछली बार लिया हुआ toy आज भी चल रहा है या बच्चे ने उससे कुछ सीखा, तो उन्हें व्यक्तिगत satisfaction मिलता है।
उनके लिए repeat customer केवल दोबारा बिक्री का संकेत नहीं है।
वह इस बात का संकेत भी है कि पहले दिया गया product और guidance customer के लिए उपयोगी रहे।
बच्चों की खुशी से जुड़ी छोटी-छोटी दुकान की कहानियां
Toy shop में बच्चों के साथ कई छोटे moments भी बनते हैं।
Sahil ने बताया कि कई बार बच्चे किसी achievement के बाद toy लेने आते हैं—जैसे अच्छे marks आने पर parents ने toy देने का promise किया हो।
कुछ बच्चे दुकान में आते ही इतने excited हो जाते हैं कि एक साथ कई toys मांगने लगते हैं।
उनकी खुशी देखकर parents भी खुश होते हैं।
और यही वह moment है जहां एक सामान्य खरीदारी एक family memory में बदल जाती है।
Sahil का Parenting Message
पूरी बातचीत के अंत में Sahil ने parents के लिए एक बहुत practical message दिया।
उनका कहना है कि parents को बच्चों की safety और activities पर नजर रखनी चाहिए, लेकिन बच्चों को हर समय restrict नहीं करना चाहिए।
बच्चों को:
- खेलने दें
- दूसरे बच्चों से मिलने दें
- outdoor experience लेने दें
- अपनी interests explore करने दें
- mistakes और experiences से सीखने दें
लेकिन साथ ही parents की “eagle watch” बनी रहनी चाहिए।
यह approach उनके पूरे conversation का सार कही जा सकती है:
Guidance हो, लेकिन हर कदम पर control नहीं।
Sahil Diwan Conversation से प्रमुख बातें
इस बातचीत से कुछ practical observations सामने आते हैं:
1. Technology को पूरी तरह ignore करना आसान समाधान नहीं है
Mobile और Internet बच्चों की दुनिया का हिस्सा हैं। उनके उपयोग की सीमा और दिशा महत्वपूर्ण है।
2. Toys learning का माध्यम भी हो सकते हैं
Educational और assembly-based toys बच्चों को खेलते हुए सीखने का अवसर दे सकते हैं।
3. Outdoor play का अपना महत्व है
Sahil के अनुसार बच्चों को सुरक्षित वातावरण में बाहर खेलने और socialise करने का अवसर मिलना चाहिए।
4. महंगा toy हमेशा बेहतर नहीं होता
Toy की suitability, quality और बच्चे की जरूरत अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
5. Parents को बच्चों के साथ balance रखना चाहिए
Safety और guidance के साथ बच्चों को अपनी राह explore करने की freedom भी मिलनी चाहिए।
6. Customer satisfaction long-term relationship बनाती है
Sahil के लिए customer को सही product और अच्छा experience देना business का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यह Conversation किन लोगों के लिए उपयोगी है?
यह episode खास तौर पर इन लोगों के लिए relevant हो सकता है:
- Parents
- Young families
- Teachers और educators
- Toy industry से जुड़े लोग
- Small business owners
- Retailers और shopkeepers
- Child development में interest रखने वाले viewers
- Digital parenting पर सोचने वाले parents
- वे लोग जो childhood और technology के बदलते relationship को समझना चाहते हैं
Watch the Full Sahil Diwan Podcast
Sahil Diwan के साथ पूरी बातचीत में toy business, childhood memories, parenting, mobile use, screen time, educational toys, outdoor play, customer satisfaction और बच्चों को freedom देने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई है।
Watch Full Episode on YouTube:
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Frequently Asked Questions
Sahil Diwan कौन हैं?
Sahil Diwan toy business से जुड़े हैं और उन्होंने बताया कि उन्होंने 2013 में इस line में काम शुरू किया था। उनके अनुभव का बड़ा हिस्सा बच्चों और parents के साथ रोज़ की interaction से जुड़ा है।
Sahil Diwan के अनुसार Mobile या Toy में क्या बेहतर है?
Rapid-fire segment में उन्होंने Toy चुना, लेकिन उन्होंने mobile और technology को पूरी तरह reject नहीं किया। उनका जोर controlled और purposeful use पर था।
क्या बच्चों के लिए screen time बिल्कुल बंद कर देना चाहिए?
Sahil की बातचीत में ऐसा निष्कर्ष नहीं दिया गया। उन्होंने technology को learning के लिए उपयोगी माना, लेकिन उसके इस्तेमाल में limits और parental monitoring की बात की।
क्या महंगे toys ही अच्छे होते हैं?
Sahil के अनुसार जरूरी नहीं। उन्होंने कम कीमत में भी अच्छी quality और educational value वाले toys उपलब्ध होने की बात कही।
क्या बच्चों को outdoor खेलने देना चाहिए?
Sahil ने outdoor play और physical activity को महत्वपूर्ण बताया, साथ ही safe environment की जरूरत पर भी जोर दिया।
Parents के लिए Sahil का मुख्य message क्या है?
उनका message broadly यह है कि parents बच्चों पर नजर रखें और guide करें, लेकिन उन्हें हर कदम पर restrict करने के बजाय सुरक्षित तरीके से अपनी राह और experiences explore करने का अवसर दें।